जब बात मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण क्षेत्र) की आती है, तो पारंपरिक रूप से इसे पुरुषों का गढ़ माना जाता है। इस क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम है, लेकिन कुछ ऐसी असाधारण महिलाएं भी हैं जो इस धारणा को पूरी तरह से बदल रही हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक शख्सियत हैं आस्था फोगला जटिया, निदेशक, फोगला ग्रुप। हाल ही में उन्हें 'बिजनेस एंड एंटरप्रेन्योरशिप अवार्ड' से नवाजा गया है। आइए जानते हैं उनकी स्कूल के दिनों से लेकर वैश्विक मंच तक की अनकही और संघर्ष भरी सफलता की कहानी। जन्मजात स्पष्टता और पारिवारिक जुड़ाव जब लोग आस्था से पूछते हैं कि उन्हें मैन्युफैक्चरिंग जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली, तो उनका जवाब बेहद स्पष्ट होता है—यह उन्हें विरासत में मिला है। उन्होंने अपने पिता को फोगला ग्रुप को उसके वर्तमान मुकाम तक पहुँचाने के लिए अनकही मेहनत करते देखा है। स्कूल के दिनों से ही उनके मन में बिल्कुल साफ था कि वे इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाएँगी और अपने पारिवारिक व्यवसाय को नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगी।
ज़मीन से जुड़कर शुरुआत: रिजिड पैकेजिंग डिविजन बर्कले से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद आस्था ने पारिवारिक व्यवसाय की कमान संभाली। संयोग से, उस समय कंपनी अपनी एकीकरण प्रक्रिया (Integration Process) से गुजर रही थी और एक नए 'रिजिड पैकेजिंग डिविजन' की स्थापना हो रही थी। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी, और आस्था ने इसे पूरी शिद्दत से निभाया। उन्होंने: भूमि पूजन से लेकर शुरुआत की, मशीनरी की खरीद-फरोख्त संभाली, और अंत में बिक्री (Sales) व वित्त (Finance) का मोर्चा भी खुद ही संभाला। उनकी इस मेहनत का नतीजा यह निकला कि एक छोटा सा संयंत्र आज पूर्वी भारत में single-blow molded barrel का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। हाल ही में कंपनी ने चेन्नई में ₹200 करोड़ का एक बड़ा निवेश प्रोजेक्ट भी पूरा किया है, जो राज्य से बाहर फोगला ग्रुप का पहला बड़ा विस्तार है।
"इम्पैक्ट का मतलब पहचान है" व्यवसाय में सफलता के मायने पर बात करते हुए आस्था कहती हैं: "मेरे लिए 'इम्पैक्ट' का मतलब पहचान है। व्यवसाय में हर दिन हमारा इम्पैक्ट हमारी 'बॉटम लाइन' और 'टॉप लाइन' की वृद्धि से मापा जाता है। लेकिन आप समाज के लिए और अपने व्यवसाय के माध्यम से क्या करते हैं, वही असली मायने रखता है।" कार्यस्थल पर बदलाव और महिला सशक्तीकरण जब आस्था ने पहली बार फोगला ग्रुप जॉइन किया था, तब कंपनी में महिलाओं की संख्या न के बराबर थी—वहाँ केवल एक रिसेप्शनिस्ट हुआ करती थी। लेकिन उनके नेतृत्व ने इस संस्कृति को बदला। आज अगर आप उनके कार्यालय में कदम रखेंगे, तो आपको कई महिला चेहरे सशक्त और महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई देंगे।
जुनून बनाम रूढ़ियाँ: माँ भी, उद्यमी भी एक महिला उद्यमी के रूप में उनकी राह आसान नहीं थी। समाज आज भी एक महिला से हर मोर्चे पर—चाहे वह एक माँ हो या पत्नी—पूर्णता की उम्मीद करता है। लेकिन आस्था का मानना है कि आपकी असली पहचान आपका काम और आपका जुनून है। जब उनका बेटा महज दो महीने का था, तब भी वे काम पर वापस लौट आई थीं। उनके अनुसार, यदि आपके पास अपने काम के प्रति सच्चा जुनून है, तो वही चीज़ आपको हर दिन आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
चुनौतियों को पार कर वैश्विक मंच तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में महिलाओं के कम आने का एक बड़ा कारण बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) की कमी भी है। अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए आस्था बताती हैं कि जब वे बड़ी MNCs के दौरे पर जाती थीं, तो महिलाओं के लिए वॉशरूम तक की उचित सुविधा नहीं होती थी—सिर्फ कागजी औपचारिकता के लिए रिकॉर्ड में वॉशरूम होता था जो वर्षों से इस्तेमाल नहीं हुआ होता था। इन्हीं तमाम बाधाओं को पार करते हुए जब वे प्रॉक्टर एंड गैंबल (P&G) जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर पहुँचीं, जहाँ उन्होंने चीन और अमेरिका के दिग्गज CEOs के बीच सबसे कम उम्र के वक्ताओं में से एक के रूप में भाषण दिया, तो वह क्षण उनके लिए बेहद विनम्र और गर्व से भर देने वाला था।
निष्कर्ष आस्था फोगला जटिया की यह कहानी साबित करती है कि यदि आपके पास स्पष्ट दृष्टिकोण, पक्का इरादा और काम के प्रति अटूट जुनून हो, तो किसी भी रूढ़िवादी दीवार को गिराया जा सकता है। उनकी यह सफलता न केवल फोगला ग्रुप के लिए, बल्कि भारत की हर उस युवा महिला के लिए प्रेरणा है जो कॉरपोरेट जगत और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती है।